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एजुकेशन केरियर में इतनी बार हुए फैल ,फिर भी ठान ली और बुलन्द होशले से बन गए RAS, प्रेणादायक कहानी है इनकी

राजस्थान
अगर इंसान ठान ले तो उसके लिए कोई मंजिल मुश्किल नहीं। एजुकेशन कॅरिअर में 19 बार फेल होकर भी प्रशासनिक अधिकारी बने पाली के दलपतसिंह की कहानी भी ऐसी ही है। अपने बचपन के साथी का आईएएस में चयन हुआ तो उन्होंने भी जिद कर ली कि प्रशासनिक अधिकारी ही बनना है। बारहवीं में दो बार और फर्स्ट ईयर में चार बार फेल


बारहवीं में दो बार और फर्स्ट ईयर में चार बार फेल हो गए तो एक बारगी हौसला टूटा। लेकिन फिर कुछ साथियों ने हौसला बढ़ाया तो जुट गए। दूसरे प्रयास में ही आईएएस के लिए ओवर एज हो गए तो आरएएस के लिए मेहनत करने लगे। यहां दो प्रयास के बाद उन्होंने प्रदेश में 55वीं रैंक हासिल कर ली। उन्हें लेखा सेवा का कैडर मिला है और फिलहाल उदयपुर में पीएचईडी में कार्यरत हैं।

युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा

जिले के गुडा केसर सिंह के रहने वाले दलपत सिंह राठौड़ खासकर उन युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा हैं जो एक-दो बार की असफलता में ही निराश हो जाते हैं। वे कहते हैं निराशा उन्हें भी हुई जो स्वाभाविक है लेकिन जिद पक्की है तो वह हावी नहीं हो सकती। उन्हें इस सपने को पूरा करने के लिए परिजनों और दोस्तों का सहयोग भी मिला। खासकर पिता मोहनसिंह, बचपन के साथी और आईएएस मित्र अविनाश चंपावत, प्रभुदयाल सिंह और राजेंद्रसिंह डिंगाई लगातार उनका हौसला बढ़ाते रहे।

परीक्षाओं में असफलता से भी नहीं घबराए, हो गए कामयाब ​

राठौड़ ने 1991 में 10वीं पास की। वे 12वीं में 1993 से 1994 तक फेल हुए। इसके बाद 1995 में ग्रेस मार्क की सहायता से पास हुए। इसके बाद फर्स्ट ईयर में 1996 से 99 तक चार बार फेल हुए और वर्ष 2000 में बीए पूरी की। इस दौरान पीएमटी, बीएसटीसी, पीईटी, ज्वांइन इंटर टेस्ट, कृषि विभाग, एसटीई, मेडिकल कंपाउडर की कई परीक्षाएं दी। सबमें असफलता हाथ लगी। ग्रेजुएशन के बाद दलपतसिंह ने बैंक पीओ, एसएससी, एसआई सहित एक दर्जन से अधिक एग्जाम दिए, उनमें भी कामयाबी नहीं मिली। और इसके बाद उन्होंने आईएएस बनने की ठानी। लेकिन दूसरे ही चांस में ओवर ऐज हो गए। आखिर तीसरे चांस में आरएएस परीक्षा-2008 में 55वीं रैंक लाने में कामयाब हुए। इसका रिजल्ट 2011 में आया और उन्हें लेखा सेवा का कैडर मिला।

एक ही जिद थी प्रशासनिक अधिकारी बनना है, चाहे कुछ भी हो जाए
दलपतसिंह बताते हैं कि 2003 में उनके बचपन के मित्र अविनाश चंपावत को आईएएस मे चयन हुआ जिससे उन्हें हौशला मिला। ओर उन्होंने ठान लिया कि उनमें भी कुश करने का जज्बा है और आखिर सफलता मिल ही गयी।

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